Sunday, March 22

नई दिल्ली । आयुष मंत्रालय ने रविवार को ऑस्टियोपोरोसिस जैसी एक मौन लेकिन गंभीर वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए शुरुआती निवारक देखभाल और जीवनशैली सुधारों की अत्यावश्यक आवश्यकता पर जोर दिया।

मंत्रालय ने लोगों—विशेषकर बुजुर्गों और रजोनिवृत्ति के बाद की महिलाओं—से अपील की कि वे आयुर्वेदिक निवारक उपायों, संतुलित पोषण और हल्की शारीरिक गतिविधियों को अपनाएं। 

मंत्रालय ने कहा कि इन समग्र जीवनशैली उपायों को दैनिक जीवन में शामिल करने से हड्डियां मजबूत होती हैं, फ्रैक्चर का खतरा कम होता है और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया अधिक स्वस्थ और सक्रिय बनती है।

यह बयान मंत्रालय ने विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस से पहले जारी किया, जो हर साल 20 अक्टूबर को मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य हड्डियों के स्वास्थ्य, तथा ऑस्टियोपोरोसिस और अन्य चयापचयी हड्डी रोगों की रोकथाम, पहचान और उपचार के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऑस्टियोपोरोसिस एक आम हड्डी संबंधी समस्या है जो हड्डियों को कमजोर बनाती है, जिससे वे आसानी से टूट सकती हैं। यह रोग धीरे-धीरे विकसित होता है और अक्सर तब तक लक्षण नहीं दिखाता जब तक कि कोई हड्डी टूट न जाए। कई मामलों में पहला संकेत कूल्हे, कलाई या रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर होता है, जो दर्द, झुकाव (काइफोसिस) जैसी मुद्रा में बदलाव और चोट के बाद धीमी रिकवरी का कारण बनता है।

आयुर्वेद के अनुसार, ऑस्टियोपोरोसिस मुख्य रूप से वात दोष की विकृति से जुड़ा होता है, जो हड्डियों की मजबूती और घनत्व को कमजोर करता है। यह पारंपरिक समझ आधुनिक विज्ञान की उस व्याख्या से मेल खाती है, जिसमें ऑस्टियोपोरोसिस को हड्डियों के खनिजों की कमी और उम्र या हार्मोनल परिवर्तनों से जोड़ा गया है।

एक विशेषज्ञ के अनुसार, आयुर्वेद में शुरुआती हस्तक्षेप, संतुलित आहार और अनुकूल जीवनशैली पर बल दिया गया है, जो स्वाभाविक रूप से मजबूत हड्डियों और स्वस्थ वृद्धावस्था की दिशा में मार्ग प्रदान करता है।

केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) ने लक्ष गूग्गुलु और प्रवाल पिष्टी जैसी आयुर्वेदिक औषधियों की प्रभावशीलता पर वैज्ञानिक अध्ययन किए हैं, ताकि ऑस्टियोपोरोसिस के प्रबंधन में उनकी भूमिका का प्रमाणिक मूल्यांकन किया जा सके और अस्थि-मांसपेशीय विकारों में आयुर्वेदिक हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता पर ठोस साक्ष्य तैयार किए जा सकें।

CCRAS ने निम्नलिखित प्रमुख उपाय सुझाए हैं:

  • रसायण चिकित्सा (पुनर्यौवन): उम्र के साथ हड्डियों की क्षीणता को धीमा करने और अस्थि प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए प्रारंभिक अवस्था से रसायन औषधियों का सेवन लाभकारी है।
  • स्नेहन (औषधीय मालिश): महानारायण तेल, दशमूल तेल और चंदन बाल लक्षादि तेल जैसे औषधीय तेलों से मालिश करने से हड्डियों और जोड़ों को पोषण मिलता है तथा गहराई तक ऊतकों की शक्ति बढ़ती है।
  • आयुर्वेदिक औषधियाँ: लक्ष गूग्गुलु, महायोगराज गूग्गुलु, प्रवाल पिष्टी और मुक्ताशुक्ति भस्म जैसी पारंपरिक औषधियाँ हड्डियों की मजबूती बढ़ाने और उपचार में सहायक मानी जाती हैं।
  • वातशामक आहार और जीवनशैली: कुलथी, शुण्ठी (अदरक), रसोना (लहसुन), मूंग और कुष्मांड (कद्दू) जैसे खाद्य पदार्थों के साथ-साथ अनार, आम और अंगूर जैसे फलों का सेवन हड्डियों के घनत्व और जीवनशक्ति को बनाए रखने में मदद करता है।
  • योग और मध्यम व्यायाम: विशेष योगासन शरीर में लचीलापन बढ़ाते हैं, हड्डियों और जोड़ों में रक्त संचार को सुधारते हैं और जकड़न को रोकते हैं।
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