रायपुर । बैंक यूनियनों का संयुक्त मंच (UFBU) ने भारतीय स्टेट बैंक, राष्ट्रीयकृत बैंकों, भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) तथा गैर-जीवन बीमा कंपनियों में शीर्ष स्तर के पदों पर निजी क्षेत्र के उम्मीदवारों की नियुक्ति की अनुमति देने के सरकार के निर्णय का कड़ा विरोध और निंदा की है।
ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन (AIBOC) के छत्तीसगढ़ अध्यक्ष वाई. गोपाल कृष्णा ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
संयुक्त मंच (UFBU) में निम्नलिखित संगठन शामिल हैं —
ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन (AIBEA), ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन (AIBOC), नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ बैंक एम्प्लॉइज (NCBE), ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन (AIBOA), बैंक एम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (BEFI), इंडियन नेशनल बैंक एम्प्लॉइज कांग्रेस (INBEC), इंडियन नेशनल बैंक ऑफिसर्स कांग्रेस (INBOC), नेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ बैंक वर्कर्स (NOBW) तथा नेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ बैंक ऑफिसर्स (NOBO)।
4 अक्टूबर को मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (ACC) ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) जैसे भारतीय स्टेट बैंक में पूर्णकालिक निदेशक (WTD), प्रबंध निदेशक (MD), कार्यकारी निदेशक (ED) तथा अध्यक्षों की नियुक्ति हेतु “संशोधित समेकित दिशा-निर्देश” (Revised Consolidated Guidelines) को मंजूरी दी।
UFBU की प्रमुख आपत्तियाँ
1. कानून और संविधान का उल्लंघन
नए दिशा-निर्देशों के तहत निजी क्षेत्र के उम्मीदवारों को शीर्ष पदों पर नियुक्त किया जा सकता है, जबकि आवश्यक अधिनियमों — जैसे भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम (1955), बैंकिंग कंपनियाँ (अधिग्रहण एवं उपक्रम) अधिनियम (1970 और 1980) तथा LIC अधिनियम (1956) — में कोई संशोधन नहीं किया गया है।
UFBU का कहना है कि यह कदम असंवैधानिक, विधि-विरुद्ध तथा वैधानिक सार्वजनिक संस्थानों के नेतृत्व के अप्रत्यक्ष निजीकरण के समान है।
2. सार्वजनिक स्वरूप और जवाबदेही पर खतरा
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और LIC सामाजिक एवं राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थापित संस्थान हैं, न कि लाभ केंद्रित निजी कंपनियाँ।
निजी क्षेत्र से अधिकारियों की नियुक्ति सार्वजनिक जवाबदेही, संप्रभु दायित्व और संस्थागत मूल्यों को कमजोर करेगी।
3. प्रक्रियात्मक और संरचनात्मक त्रुटियाँ
APAR आधारित मूल्यांकन प्रणाली को समाप्त कर मानव संसाधन एजेंसियों द्वारा किए जाने वाले व्यवहारिक मूल्यांकन (Behavioural Assessment) को लागू करना वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी योग्यता मानकों को समाप्त करता है।
इससे पक्षपात, अपारदर्शिता तथा भाई-भतीजावाद को बढ़ावा मिलेगा।
4. मनोबल और संस्थागत निरंतरता पर प्रभाव
बाहरी उम्मीदवारों को अवसर देना और दीर्घकाल से कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकारियों को दरकिनार करना कर्मचारियों के मनोबल को कमजोर करेगा, उत्तराधिकार योजना में बाधा डालेगा और संस्थागत अनुभव को नष्ट करेगा।
UFBU ने नई ACC गाइडलाइनों को तत्काल निलंबित करने की मांग की है और एक संयुक्त हितधारक समिति (Joint Stakeholder Committee) गठित करने का आग्रह किया है, जिसमें DFS, RBI, FSIB, UFBU और विधि विशेषज्ञों के प्रतिनिधि शामिल हों, ताकि नियुक्ति ढांचे की समीक्षा की जा सके।
संगठन ने यह भी आग्रह किया है कि इस मुद्दे को संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Finance) को भेजा जाए, ताकि किसी भी सुधार को लागू करने से पहले सार्वजनिक एवं हितधारक परामर्श सुनिश्चित किया जा सके।
UFBU ने इस नीति को भारत की सार्वजनिक क्षेत्र प्रणाली पर एक “संरचनात्मक हमला” (structural assault) बताया है — और चेतावनी दी है कि यह कार्यपालिका-प्रेरित निजीकरण तथा आर्थिक संप्रभुता के क्षरण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।


