Wednesday, February 4

नई दिल्ली | नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की एक रिपोर्ट ने शुक्रवार को स्किलिंग और छोटे उद्यमों की भारत में रोजगार सृजन के प्रमुख कारकों के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।

रिपोर्ट आगे बताती है कि कार्यबल की भागीदारी और श्रम उत्पादकता की गुणवत्ता और मात्रा—दोनों को बढ़ाने में मौजूद बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, हाल के दिनों में रोजगार में वृद्धि मुख्य रूप से स्व-रोजगार में बढ़ोतरी के कारण हुई है, जबकि कुशल श्रम बल में परिवर्तन की गति धीमी रही है। श्रम-प्रधान विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोजगार अवसरों को मजबूत करना, विक्सित भारत की परिकल्पना के अनुरूप, लगभग 8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि बनाए रखने में मदद कर सकता है।

डिजिटल तकनीकों का उपयोग करने वाले उद्यम, ऐसी तकनीकों का उपयोग नहीं करने वालों की तुलना में 78 प्रतिशत अधिक श्रमिकों को नियुक्त करते हैं। यहां तक कि ऋण उपलब्धता में 1 प्रतिशत की वृद्धि भी नियुक्त किए जाने वाले श्रमिकों की अपेक्षित संख्या को 45 प्रतिशत तक बढ़ा देती है।

आपूर्ति पक्ष पर, नई तकनीकों और एआई के आगमन के साथ भारत का कार्यबल अपस्किलिंग से काफी लाभ उठा सकता है। मध्यम-कौशल वाले कार्य विशेष रूप से सेवाओं में रोजगार वृद्धि पर हावी हैं, जबकि विनिर्माण क्षेत्र अभी भी मुख्य रूप से कम-कौशल आधारित है।

रिपोर्ट में कहा गया है, “औपचारिक स्किलिंग में निवेश के माध्यम से कुशल कार्यबल का अनुपात 12 प्रतिशत अंक बढ़ाने से 2030 तक श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार में 13 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हो सकती है।”

रिपोर्ट यह भी अनुमान लगाती है कि विनिर्माण और सेवाओं के अपेक्षाकृत अधिक श्रम-प्रधान उप-क्षेत्रों के सकल उत्पादन (GO) में मध्यम वृद्धि 2030 तक उल्लेखनीय रोजगार सृजन कर सकती है — वस्त्र, परिधान और संबंधित उद्योगों में 53 प्रतिशत की वृद्धि, और व्यापार, होटल व संबंधित सेवाओं में रोजगार में 79 प्रतिशत की वृद्धि।

रिपोर्ट विशिष्ट क्षेत्रों में रोजगार क्षमता को बढ़ाने के लिए लक्षित हस्तक्षेपों की सिफारिश करती है।

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