नई दिल्ली | केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने शनिवार को कहा कि वर्तमान में उपलब्ध वजन घटाने वाली या मोटापा-रोधी दवाओं का उपयोग बहुत विवेकपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह बात दो दिवसीय “एशिया ओशिनिया कॉन्फ्रेंस ऑन ओबेसिटी” (AOCO) के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कही।
उन्होंने मोटापा प्रबंधन से जुड़े बढ़ते व्यवसायीकरण और भ्रामक जानकारी के प्रति आगाह किया। उन्होंने चेतावनी दी कि वैज्ञानिक आधारहीन दावे और तथाकथित ‘त्वरित समाधान’ (क्विक-फिक्स सॉल्यूशंस) अक्सर लोगों को गुमराह करते हैं और उन्हें साक्ष्य-आधारित देखभाल से दूर ले जाते हैं।
डॉ. सिंह, जो स्वयं एक मधुमेह रोग विशेषज्ञ (डायबेटोलॉजिस्ट) और मेडिसिन के प्रोफेसर हैं, ने कहा कि मोटापा एक जटिल, पुरानी और बार-बार होने वाली बीमारी है, न कि केवल कोई कॉस्मेटिक या जीवनशैली संबंधी चिंता। उन्होंने भारत की सबसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक के रूप में उभरी इस समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए ‘संपूर्ण समाज के दृष्टिकोण’ (होल-ऑफ-सोसाइटी अप्रोच) का आह्वान किया।
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत में गैर-संचारी रोगों (NCDs) में चिंताजनक वृद्धि हो रही है, जिनमें से कई किसी न किसी तरह से मोटापे से जुड़े हैं, और जो कुल मृत्यु दर का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि 2014 से स्वास्थ्य, राष्ट्रीय नीति निर्माण के केंद्र में आ गया है, जिसमें सरकार रोकथाम (prevention), सामर्थ्य (affordability) और समय रहते हस्तक्षेप (early intervention) पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
मंत्री ने ‘एआईएएआरओ ओबेसिटी रजिस्ट्री’ (AIAARO Obesity Registry) भी लॉन्च की, जो व्यवस्थित डेटा संग्रह, साक्ष्य-आधारित अंतर्दृष्टि और दीर्घकालिक नीति समर्थन के माध्यम से भारत के मोटापा अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल है।
इस सम्मेलन का उद्देश्य वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करके, अनुसंधान सहयोग को आगे बढ़ाकर और मोटापे के साक्ष्य-आधारित प्रबंधन को मजबूत करके चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को सशक्त बनाना है।
