वाशिंगटन और बीजिंग के बीच ऊर्जा और व्यापार को लेकर चल रही तनातनी अब एक और मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दी गई चेतावनियों के बावजूद चीन ने साफ कर दिया है कि वह रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखेगा। इससे पहले भारत ने भी साफ शब्दों में कहा था कि वह अपनी ऊर्जा नीति को राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करेगा।
अमेरिका की चेतावनी और ट्रंप का कड़ा रुख
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक चुनावी रैली में घोषणा की थी कि यदि कोई भी देश रूस से तेल खरीदेगा तो उस पर अमेरिका 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है और अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बनाने की नीति पर काम कर रहा है।
ट्रंप की इस चेतावनी के बाद चीन और अमेरिका के अधिकारियों के बीच स्टॉकहोम में दो दिनों की ट्रेड वार्ता हुई। इसमें अमेरिका की ओर से वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीन की ओर से उप-प्रधानमंत्री हे लाइफेंग शामिल हुए।
चीन का दो-टूक जवाब: ‘नेशनल इंटरेस्ट पहले’
चीन के विदेश मंत्रालय ने बैठक के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी साझा करते हुए कहा,
“चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों की आपूर्ति अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर करता रहेगा। दबाव और धमकियों से हम अपनी नीति नहीं बदलेंगे।”
इसमें यह भी जोड़ा गया कि
“चीन अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और विकास के हितों की रक्षा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।”
यह बयान इस बात का संकेत है कि ट्रंप की धमकियों का चीन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा और वह अपनी ऊर्जा आपूर्ति रणनीति को स्वतंत्र रूप से संचालित करेगा।
स्टॉकहोम वार्ता में क्या तय हुआ?
स्टॉकहोम में संपन्न वार्ता का उद्देश्य अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव को कम करना था। इसमें दोनों देशों ने फिलहाल एक-दूसरे पर नए टैरिफ नहीं लगाने पर सहमति जताई। हालांकि अमेरिका चीनी वस्तुओं पर 30% टैरिफ वसूलेगा और चीन अमेरिकी वस्तुओं पर 10% टैरिफ लगाएगा। अंतिम निर्णय ट्रंप द्वारा लिया जाएगा, क्योंकि वह रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी और प्रमुख नीति निर्धारक हैं।
स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, दोनों देशों के बीच 90 दिनों में फिर से एक बैठक हो सकती है।
ऊर्जा के मोर्चे पर चीन की मजबूती
चीन विश्व की सबसे बड़ी ऊर्जा उपभोक्ता अर्थव्यवस्था है। ऐसे में कच्चे तेल की स्थिर आपूर्ति उसके आर्थिक ढांचे के लिए अत्यंत आवश्यक है। चीन के लिए रूस एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद तेल आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
2024 में चीन ने रिकॉर्ड मात्रा में तेल खरीदा
रिपोर्ट्स के अनुसार, 2024 में चीन ने रूस से अपने कुल कच्चे तेल का 21.5% आयात किया। जबकि 2018 से 2021 के बीच यह औसत मात्र 15.5% था। इस बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण रूस द्वारा अपने यूराल क्रूड ऑयल पर दी जा रही भारी छूट है।
यूराल क्रूड की कीमत ब्रेंट ब्लेंड और दुबई क्रूड से कम होती है, जिससे चीन को किफायती दरों पर ऊर्जा मिलती है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस के पास सीमित खरीदार हैं और यही वजह है कि वह चीन और भारत जैसे देशों को रियायत देता है।
भारत पहले ही दे चुका है जवाब
इससे पहले भारत ने भी ट्रंप की चेतावनी को दरकिनार करते हुए कहा था कि वह अपनी ऊर्जा नीति को राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुसार तय करेगा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि
“हम अपने नागरिकों को सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा प्रदान करने के लिए हर संभव विकल्प पर काम करते रहेंगे।”
भारत भी रूस से रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों के अनुसार, 2023-24 में भारत ने रूस से अपना 35% कच्चा तेल आयात किया।
अमेरिका का उद्देश्य क्या है?
अमेरिका का उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है, ताकि वह यूक्रेन युद्ध के लिए फंडिंग ना कर सके। अमेरिका चाहता है कि विश्व के अन्य देश रूस और ईरान से ऊर्जा खरीदना बंद करें, जिससे इन देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़े। इसी रणनीति के तहत ट्रंप ने 100% टैरिफ की धमकी दी है।
लेकिन सवाल ये है — क्या यह रणनीति सफल होगी?
जानकारों का मानना है कि चीन और भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश अपनी नीति अमेरिका के कहने पर नहीं बदलेंगे। उनके लिए ऊर्जा सुरक्षा प्राथमिकता है और वे वैश्विक राजनीति से ऊपर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं।
क्या होगा इस नीति का असर?
चीन के इस कड़े रुख से अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध और तेज हो सकता है। ट्रंप यदि दोबारा सत्ता में आते हैं, तो वे चीन से आने वाली वस्तुओं पर भारी शुल्क लगा सकते हैं। इससे वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
वहीं रूस के लिए यह राहत की खबर है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश — भारत और चीन — उसकी ऊर्जा आपूर्ति के सबसे बड़े ग्राहक बने हुए हैं।
क्या रूस के पास विकल्प हैं?
रूस के लिए पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद चीन, भारत, तुर्की और कुछ अफ्रीकी देशों जैसे विकल्प ही बचे हैं। यही कारण है कि रूस इन देशों को डिस्काउंट पर तेल बेचता है और लॉन्ग-टर्म डील की पेशकश करता है।
रूस क्यों बेच रहा है सस्ता तेल?
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रूस पर यूरोप और अमेरिका के कड़े आर्थिक प्रतिबंध लागू हैं।
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पश्चिमी देशों ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है।
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तेल स्टोरेज की सीमाएं हैं, उत्पादन कम करना महंगा साबित होता है।
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डिस्काउंट देकर निर्यात बढ़ाना रूस के लिए ज्यादा व्यावहारिक है।
