नई दिल्ली । भारत की ऊर्जा परिवर्तन यात्रा एक निर्णायक चरण में प्रवेश कर रही है। देश ने 2030 तक प्रति वर्ष 5 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) हरित हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जिससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटेगी और घरेलू स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
बुधवार को जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया कि भारत सरकार ने 2023 में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (एनजीएचएम) शुरू किया था, जिससे ₹8 लाख करोड़ से अधिक के निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है।
इस मिशन से 6 लाख से अधिक रोजगार सृजित होने, जीवाश्म ईंधन आयात में ₹1 लाख करोड़ से अधिक की कमी आने और 2030 तक हर वर्ष लगभग 50 एमएमटी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आने का अनुमान है।
मिशन चार प्रमुख स्तंभों पर केंद्रित है — नीति एवं विनियामक ढांचा, मांग सृजन, अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार, और सहायक अवसंरचना एवं पारिस्थितिकी तंत्र का विकास। इन सभी का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।
मिशन के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और उपयोग को तेज करना, घरेलू विनिर्माण और निर्यात को प्रोत्साहित करना, नियामक अनुपालन सुनिश्चित करना और सार्वजनिक–निजी साझेदारियों को मजबूत करना है।
हरित हाइड्रोजन का उत्पादन अक्षय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर या पवन ऊर्जा से किया जाता है, न कि जीवाश्म ईंधनों से। इस प्रक्रिया में पानी को इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है, जिसके लिए सौर पैनलों या पवन टर्बाइनों से उत्पन्न बिजली का उपयोग किया जाता है।
मई 2025 तक, 19 कंपनियों को कुल 8.62 लाख टन वार्षिक हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता आवंटित की गई है, जबकि 15 कंपनियों को संयुक्त रूप से 3,000 मेगावाट की वार्षिक इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण क्षमता प्रदान की गई है। भारत ने इस दिशा में इस्पात, गतिशीलता और शिपिंग क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन के उपयोग के लिए प्रायोगिक परियोजनाएं भी शुरू की हैं।


