नई दिल्ली । केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए “दालों में आत्मनिर्भरता मिशन” को मंजूरी दी।
इसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना, बढ़ती मांग को पूरा करना, उत्पादन को अधिकतम करना और किसानों की आय में वृद्धि करना है।
यह मिशन छह वर्षों की अवधि में लागू किया जाएगा, वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक, जिसकी वित्तीय लागत 11,440 करोड़ रुपये होगी।
भारत की फसल प्रणाली और आहार में दालों का विशेष महत्व है। भारत दालों का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है।
बढ़ती आय और जीवन स्तर के साथ दालों की खपत में वृद्धि हुई है। हालांकि, घरेलू उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं बढ़ पाया है, जिसके कारण दालों के आयात में 15–20% की वृद्धि हुई है।
यह मिशन अनुसंधान, बीज प्रणाली, क्षेत्र विस्तार, खरीद और मूल्य स्थिरता को शामिल करते हुए एक व्यापक रणनीति अपनाएगा।
इसमें उच्च उत्पादकता, कीट-प्रतिरोधी और जलवायु-सहिष्णु नई किस्मों के विकास और प्रसार पर जोर दिया जाएगा। प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में क्षेत्रीय उपयुक्तता सुनिश्चित करने के लिए बहु-स्थान परीक्षण किए जाएंगे।
गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राज्य पांच वर्षीय रोलिंग बीज उत्पादन योजनाएँ तैयार करेंगे।
उन्नत किस्मों को व्यापक रूप से उपलब्ध कराने के लिए 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज दाल उत्पादक किसानों को वितरित किए जाएंगे, जिससे वर्ष 2030-31 तक 370 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जाएगा।
बाज़ार और मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करने के लिए मिशन कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे का विकास करेगा, जिसमें 1,000 प्रसंस्करण इकाइयाँ शामिल होंगी। इससे फसल हानि कम होगी, मूल्य संवर्धन में सुधार होगा और किसानों की आय बढ़ेगी।
प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाइयों की स्थापना के लिए अधिकतम 25 लाख रुपये की सब्सिडी उपलब्ध कराई जाएगी।
वर्ष 2030-31 तक, इस मिशन से दालों के तहत क्षेत्र 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ने और उत्पादन 350 लाख टन तक पहुँचने की उम्मीद है।


