रायपुर। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स (UFBU) ने गुरूवार को अपने आधिकारिक बयान में केंद्र सरकार के बैंक निजीकरण के अप्रत्यक्ष समर्थन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए है अपना कड़ा विरोध दर्ज किया है।
UFBU के बयान के अनुसार, केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में आयोजित हीरक जयंती समापन व्याख्यान दिया था। जब एक छात्र द्वारा यह आशंका व्यक्त किए जाने पर कि निजीकरण से बैंकिंग सेवाएँ केवल चुनिंदा विशेष वर्गों तक सीमित हो सकती हैं तो वित्तमंत्री ने इस आशंका को नजरंदाज करते हुए निजीकरण को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया।
UFBU ने कहा कि वो इस धारणा को पूर्णतः अस्वीकार करते है और पुनः स्पष्ट करते है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही भारत की वित्तीय समावेशिता, सामाजिक न्याय आधारित ऋण व्यवस्था, ग्रामीण बैंकिंग विस्तार एवं राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता की रीढ़ हैं। भारत को बदलने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका 1969 में बैंक राष्ट्रीयकरण केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं था — इसने देश की सामाजिक–आर्थिक व्यवस्था की दिशा ही बदल दी।सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक समान एवं समावेशी राष्ट्रीय विकास के साधन बने।
UFBU ने आगे कहा, “राष्ट्रीयकरण से पूर्व बैंकिंग सेवाएँ केवल बड़े उद्योग घरानों और विशेष व्यवसायिक वर्ग तक सीमित थीं। बैंको के सार्वजनिक स्वामित्व ने किसानों, मजदूरों, महिलाओं, लघुउद्यमों, कमजोर वर्गों एवं ग्रामीण जनता केलिए ऋणव्यवस्था के द्वार खोले।चंद हजार शहरी शाखाओं से बढ़कर बैंकिंग सेवाएँ लाखों गाँवों तकपहुँचीं।”
UFBU ने कहा, “निजी बैंक ऐसा कभी नहीं करते क्योंकि ग्रामीण बैंकिंग को वे कम लाभकारी मानते हैं। प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, कृषि ऋण, SC/ST ऋण योजनाएँ, स्वयंसहायता समूह, ग्रामीण स्वरोजगार, छात्र ऋण, MSME सहायताऔरसामाजिक कल्याण योजनाएँ सार्वजनिक बैंकों के माध्यम से ही संभव हुईं है।आर्थिकमंदी, वैश्विक संकटऔर COVID-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक बैंकों ने राष्ट्र को संभाला — न तो ढहे, न जनता से मुँह मोड़ा।”
UFBU ने निजीकरण के दुष्प्रभाव और जोखिम को समझते हुए कहा, “निजी बैंक केवल वहीं ऋण देते हैं जहाँ लाभ अधिक है। वे घाटे वाले क्षेत्रों में शाखाएँ बंद करते हैं, शुल्क बढ़ाते हैं और कमजोर वर्गों की उपेक्षा करतेहैं। ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी भारत वित्तीय बहिष्करण का शिकार हो जाएगा। जन-धन, DBT, पेंशन, मनरेगा भुगतान — यह सब मुख्यतः PSBs द्वारा किया जाता है। निजीकरण से कर्मचारियों की नौकरियाँ असुरक्षित होंगी, संविदाआधारित नियुक्तियाँ बढ़ेंगी, आरक्षण लाभ क्षीण होंगे और ट्रेडयूनियनों के अधिकार सीमित होंगे। YES Bank, Global Trust Bank, Lakshmi Vilas Bank जैसे कई निजी बैंकों में शासन विफलताएँ देश पहले ही देख चुका है। हर बार सार्वजनिक बैंकों नेही जमाकर्ताओं को बचाया। सार्वजनिक धन से निर्मित राष्ट्रीय संपत्ति अंततः निजी कॉर्पोरेट हाथों में चली जाएगी।”
UFBU ने महत्वपूर्ण तथ्य बताते हुए कहा, “सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक संसद, CAG और जनता के प्रति उत्तरदायी हैं; निजी बैंक केवल शेयरधारकों के प्रति। NPA संकट किसानों या छोटे ऋणकर्ताओं के कारण नहीं हुआ — यह बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टर्स के कारण हुआ है। 2008 के वैश्विक संकट के बाद कई देशों ने बैंकिंग में सरकारी नियंत्रण बढ़ाया, कम नहीं किया। सार्वजनिक बैंक केवल वाणिज्यिक संस्थाएँ नहीं, जनहित उपक्रम हैं।”
UFBU ने कहा कि वास्तविकता यह है कि आज भारतीय बैंकिंग की मजबूती सार्वजनिक क्षेत्र के कारण है जैसे जन-धन खातों में 90% से अधिक कार्यान्वयन — PSBs द्वारा, COVID-19 के दौरान DBT भुगतान — PSBs के नेटवर्क पर आधारित, प्राथमिकताऋण, MSME समर्थन, वित्तीयसाक्षरता — PSBs केंद्र में और दुनिया का कोई भी देश केवल निजी बैंकों के भरोसे सार्वभौमि कबैंकिंग उपलब्ध नहीं कर पाया है।
UFBU ने कहा कि निजीकरण राष्ट्रीय एवं सामाजिक हित के विरुद्ध है, यह वित्तीय समावेशिता को कमजोर करेगा, यह रोजगारऔरसार्वजनिक धन की सुरक्षा को खतरे में डालेगा, इसका लाभ नागरिकों को नहीं, केवल कॉर्पोरेट घरानों को होगा।
UFBU ने मांग की है कि भारत सरकार स्पष्ट घोषणा करे कि कोई भी सार्वजनिक क्षेत्र बैंक निजीकरण के लिए नहीं दिया जाएगा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पूँजी, तकनीक एवं पारदर्शी शासन के माध्यम से मजबूत किया जाए जमाकर्ताओं, कर्मचारियों एवं आम नागरिकों के हितों को प्रभावित करने वाले किसी भी निर्णय से पूर्व सार्वजनिक विमर्श एवं संसदीय बहस अनिवार्य की जाए।
बता दे कि UFBU देश भर के सभी बैंकों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की नौ प्रमुख यूनियनों का प्रतिनिधित्व करता है।
