नई दिल्ली | सरकार के अनुसार, नई श्रम संहिताएँ भारत के निर्यात क्षेत्र — जैसे टेक्सटाइल, परिधान, चमड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न और आभूषण, दवाइयाँ, ऑटो पार्ट्स और आईटी सेवाएँ — को कई तरह के फायदे देंगी।
इनमें खासतौर पर नियोक्ताओं के लिए नियमों का पालन आसान होना और कार्यबल के बेहतर प्रबंधन की सुविधा शामिल है।
इन उद्योगों की प्रतिस्पर्धा इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का पालन करते हुए एक लचीला, नियमों का पालन करने वाला और कुशल कार्यबल बनाए रखना होता है।
सरकार ने हाल ही में 29 पुराने कानूनों को मिलाकर चार नई संहिताएँ बनाई हैं, जिससे उद्योगों को अधिक कुशलता से चलाने में मदद मिलेगी और साथ ही मजदूरों के हित भी सुरक्षित रहेंगे।
सबसे बड़े सुधारों में एक है सभी श्रम संहिताओं में “वेतन” की एक समान परिभाषा। इससे पहले अलग-अलग कानूनों में अलग परिभाषाएँ होने से भ्रम होता था। कई राज्यों में काम करने वाले निर्यात उद्योगों के लिए यह सुधार वेतन गणना और नियमों का पालन आसान बनाता है — जैसे सामाजिक सुरक्षा, बोनस और ग्रेच्युटी की गणना।
सरकार द्वारा राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन तय करने का प्रावधान भी किया गया है। इससे कोई भी राज्य इससे कम न्यूनतम वेतन नहीं रख सकेगा। इससे अलग-अलग राज्यों में काम करने वाले निर्यात उद्योगों को श्रम लागत की बेहतर अनुमानित योजना बनाने में मदद मिलेगी और क्षेत्रीय असमानताएँ भी कम होंगी।
डिजिटल वेतन भुगतान को कानूनी मान्यता मिलने से पारदर्शी और रिकॉर्ड रखने योग्य भुगतान प्रणाली को बढ़ावा मिलता है। यह निर्यातकों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि उन्हें अक्सर वैश्विक खरीदारों और ऑडिट में भुगतान के प्रमाण दिखाने पड़ते हैं।
भर्ती और वेतन में लिंग-आधारित भेदभाव पर रोक से “समान काम के लिए समान वेतन” सुनिश्चित होता है। इससे निर्यात क्षेत्र की कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय श्रम और मानवाधिकार मानकों के अनुरूप काम कर पाती हैं, जो वैश्विक बाजारों में आवश्यक होता है।


