अमोलिक यशराज
अमेरिका ने इस वर्ष भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ़ लगाया है, जिसकी कुल राशि 48 अरब डॉलर है। वस्त्र, रत्न, समुद्री खाद्य और चमड़ा जैसे उद्योग—जो लाखों लोगों को रोजगार देते हैं—गंभीर खतरे में हैं। अब सवाल यह है: क्या भारत इस नुकसान को स्वीकार करे और अपनी जीडीपी वृद्धि दर को गिरने दे तथा बेरोज़गारी को बढ़ने दे? इसका उत्तर है—बिलकुल नहीं।
सामान्य समझ यह सुझाव दे सकती है कि सरकार प्रभावित उद्योगों को सब्सिडी दे। लेकिन ऐसा करने से सरकार की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ेगा और सरकार को कर्ज़ लेना पड़ सकता है, जिससे उसकी वित्तीय सेहत लंबे समय में कमजोर होगी। इसलिए सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए।
तो फिर, सरकार अमेरिकी टैरिफ़ के प्रभाव को कैसे कम करेगी? इसका उत्तर है—व्यापार विविधीकरण और व्यापार पुनर्संरेखन। लेकिन केवल इतना कहना बहुत सामान्य होगा, और कुछ पाठक कह सकते हैं कि यह एक दीर्घकालिक उपाय है, तात्कालिक नहीं। हालांकि, जैसा कि मार्क ट्वेन ने प्रसिद्ध रूप से कहा था: “झूठ, शापित झूठ और आँकड़े।” अब आँकड़ों से समझते हैं कि इसे एक से दो साल के भीतर कैसे कम किया जा सकता है।
पहला:-तेल पर ध्यान दें। भारत रोज़ाना 5.1 मिलियन बैरल तेल आयात करता है। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक भारत अपने आपूर्तिकर्ताओं को बदल सकता है। ईरान, वेनेज़ुएला और रूस—जो प्रतिबंधों से जूझ रहे हैं और खरीदारों की कमी से परेशान हैं—45 डॉलर प्रति बैरल की दर पर कच्चा तेल बेच सकते हैं, जो वैश्विक ब्रेंट से 30% कम है। अगर भारत अपनी ज़रूरतों का 55–65% इन देशों से पूरा करे, तो वह सालाना 12–18 अरब डॉलर बचा सकता है। कम लागत का मतलब है सस्ता ईंधन, नियंत्रित महंगाई, अधिक सरकारी राजस्व और उद्योगों की सुरक्षा। हाँ, इस कदम से प्रतिबंधों का खतरा रहेगा, लेकिन अधिकतर द्वितीयक प्रतिबंध होंगे, जिनका भारतीय अर्थव्यवस्था पर नगण्य असर होगा। इसके अलावा, भारत इनके साथ बार्टर ट्रेड कर सकता है जिससे निर्यात 15–18 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है, या फिर भारतीय रुपये में व्यापार कर सकता है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रुपया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत होगा।
दूसरा:- भारत रूस, ईरान और वेनेज़ुएला से भारतीय कंपनियों को जीवनभर कर-मुक्त दर्जा और भारतीय सामान व सेवाओं पर कम टैरिफ़ की मांग कर सकता है। इससे इन देशों को भारतीय निवेश मिलेगा और भारत को अधिक मुनाफ़ा व निवेश पर अच्छा रिटर्न मिलेगा। इससे फार्मा, खाद्य और आईटी व्यापार में 5–10 अरब डॉलर का अवसर खुलेगा।
तीसरा:- भारत क्यूबा से उसके मेडिकल शोध (जैसे Heberprot-P, CIMAvax) का लाइसेंस ले सकता है, जो मधुमेह और कैंसर जैसी उच्च मांग वाली बीमारियों पर केंद्रित है। क्यूबा अभी प्रतिबंधों में है, लेकिन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा शोध आधारों में से एक रखता है। भारत उसके शोध को लाइसेंस करके अपनी जेनेरिक दवा उद्योग से जीवनरक्षक दवाएँ बना सकता है। इस साझेदारी से क्यूबा को रॉयल्टी मिलेगी और भारत को निर्यात का लाभ। अगर भारत 2–3 अरब डॉलर के निर्यात बाज़ार में प्रवेश करता है, तो फार्मा उद्योग को 1 अरब डॉलर का मुनाफ़ा होगा और क्यूबा को भी 1 अरब डॉलर रॉयल्टी मिलेगी।
चौथा:- वर्तमान में चीन बुनियादी ढांचा संकट से जूझ रहा है, जिसके कारण लाखों इंजीनियर बेरोज़गार हो गए हैं और सामाजिक-आर्थिक अस्थिरता बढ़ी है। भारत और चीन के बीच हाल ही में संबंधों में सुधार आई है। भारत चीन से 50 अरब डॉलर निवेश की मांग कर सकता है। बदले में भारत चीनी कंपनियों को शून्य कर का आश्वासन दे सकता है और उन्हें 50% चीनी तथा 50% भारतीय इंजीनियर रखने की अनुमति दे सकता है। इससे लगभग 14 लाख नौकरियाँ पैदा हो सकती हैं। हाँ, भारत को सतर्क रहना होगा कि यह निवेश भारत की सुरक्षा को खतरा न पहुँचाए और यह निवेश सीमावर्ती या सैन्य क्षेत्रों से दूर रहे।
कुल प्रभाव? 80–90 अरब डॉलर का शुद्ध लाभ—जो अमेरिकी टैरिफ़ से हुए नुकसान की 100–200% भरपाई कर सकता है, नौकरियों की रक्षा करेगा, जीडीपी वृद्धि को 6.4–7.8% बनाए रखेगा और भारत की आर्थिक संप्रभुता को मज़बूत करेगा।


